Saturday, May 29, 2010

विजय पथ














द्वारा- जय शंकर प्रसाद

Friday, May 28, 2010

"We think sometimes that poverty is only being hungry, naked and homeless. The poverty of being unwanted, unloved and uncared for is the greatest poverty. We must start in our own homes to remedy this kind of poverty."
- Mother Teresa

Wednesday, May 12, 2010

Sunday, May 9, 2010

माँ

तेरे आगोश में लेले मुझे , मै फिर रोना चाहता हूँ माँ .......!
वो कोमल हाथो तलें फिर सोना चाहता हूँ माँ ...!!
ये किलकारियां भरते परिंदे ,सुबह- सुबह तेरी याद दिला देतें है.......!
लगाता है सोया नहीं कई दिनों से , ऐसा अहसास जगा देतें है...!!
वो पावन पवित्र सा तेरा अहसास ,अब भी झन्झकोर जाता है.....!
नहीं रह सकता हर वक्त तेरे पास , बस दिल रो कर रह जाता है ....!!
क्यों बेबस हो गया वक्त से मै , माँ बता मुझे ....?
ये कैसा विधि का विधान है ,समझ तो आया होगा तुझे .....!!
महसूस होता है तेरा प्यार मुझे, हवा सा कलेजे मै उतर रहा है......!
हर बार की तरह आज फिर तेरा लाल ,आँखे नम किये ऑफिस जा रहा है.....!!

Friday, May 7, 2010

मंजिल.....

मत रुक यहाँ , तेरा घर कही और है ....
इन्तजार में तेरे कोई तो जरुर है ....!
राहे मोहताज नहीं तेरी , क्यों इतना गुरुर है ....
रुक जायेगा गर यही तो एक अफसाना जरुर है....!
क्यों रुसवा है वक्त नादान है ...
बदलेगा एक दिन समझ ले , नहीं विरासत में मिली कोई आन है ...!
पहचान ले और रख कदम क्यों इतना वीरान है ...
पदचाप की आहाट में भी एक शान है...!
ढलती शाम गुजरे वक्त को याद दिलाएगी ...
नहीं संभल पाया तो फिर काली रात आएगी...!
हो जायेगा मजबूर तू इस बार...
लेकिन पता है मुझे तू नहीं माने इस तरह हार...!

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